Monday, December 23, 2013

बड़ी आरज़ू थी तू मिले

बड़ी आरज़ू थी तू मिले सफ़र के किसी हसी मोड़ पे
ये सोच के मै निकल लिया वीरान बस्ती छोड़कर
हादसो के सफ़र में शहर कि तरफ अकेला बढ़ता गया
थी उम्मीद तू मिल जायेगी अजनबी रास्तो कि भीड़ में
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आलोक पाण्डेय

Saturday, December 21, 2013

हिंदी शायरी

ये सदियो के फासले उस पे तेरा अजनबी बन के मिलना
तुम्हे क्या पता तुम्हे देखने से पहले जी भर के रोया था मै
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हा मुझे मिल गयी मेरी हर गुनाहो कि सजा
तेरे लिए सब कुछ खोया और तू भी ना मिली
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आंशु आँखों से बह रहे है तो कुछ तो ज़रूर हुआ होगा
हद से ज्यादा ख़ुशी मिली या अपना कोई रूठ गया होगा
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कितनी नाराज़गी थी तुझमे मुझसे रुख्सत के वक़्त
रोते -रोते  तू मुझे अलविदा कहना भी भूल गयी
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आलोक पाण्डेय