Sunday, September 29, 2013

मेरा बचपन

( मेरा बचपन ) मेरी कविता के कुछ अंश
____________________________
बचपन कुछ ऐसे बिता जैसे कुछ पल पहले मै बच्चा था
कुछ ऐसा लगता है अब की शहर से तो मेरा गाँव अच्छा था

भुला सकते भी है कैसे हम अपनी बचपन की  यादो को
बर्फ का गोला ,चूरन की पुडिया घर में मकड़ी के जाला ही अच्छा था

 जब सड़क पे  गिराता कोई बालू अपना  घर बनाने को
हम चोरी से उनसे छोटे-२  घरौदे बनाते वो ही अच्छा था

भर के हम जब  गुब्बारों में नालियों का गन्दा पानी
एक दुसरे पे उछाला करते थे वो ही अच्छा था

अब के हमारे  हीरो ,नेताओ ,घूसखोरो ,घुसपैठियों से तो
हमारा नागराज ,सुपर कमांडो ध्रुव ,तेनालीराम अच्छा था

रिश्वतो ,मैच फिक्सिंग के बिना अब मजा कहा खेल में
अपनी तो कांच की गोलिया वो गुल्ली -डंडा ही अच्छा था

अब दिन -रात पैसे कमा के बैंक  कितना भी भर लो
पर वो मुट्ठी में एक रुपये में लगता था संसार अपना था
______________________________________ ( आलोक पाण्डेय )











प्यार का दीपक यु ही जगमगाते रहे

कुछ पंक्तिया मेरी कविता की
____________________
सबसे मिलते रहे मुस्कराते रहे ,
हर दिशा से अँधेरा मिटाते  रहे
जला के दिया प्यार का दिल में
बस गले से सबको लगाते रहे

बगिया फूलो की यु ही महकती रहे
चिड़िया पेड़ो पे यु ही चहकती रहे
 हो धरा पे अँधेरा कंही भी मगर
आप जुगनू बन के जगमगाते रहे

जिदंगी की इस राह में "आलोक "
 लोग आते रहे लोग जाते रहे
रिश्ते नाते अगर है प्यार के
जब तक साथ उसे है निभाते रहे

सफ़र के दौर में आयेंगे पत्थर बहुत
पर ख्वाब जन्नत का यु ही सजाते रहे
ज़िन्दगी के सफ़र में मिले दुश्मन बहुत
कुछ दोस्त उनमे अपने याद आते रहे

क्या भला क्या बुरा जो किया सो किया
भुला के शिकवे गिले दिल मिलाते रहे
तेरे मेरे नहीं सबके जीवन में भी
प्यार का दीपक यु ही जगमगाते रहे
_______________________ ( आलोक)











Tuesday, September 17, 2013

अगर तू ना समझ है तो तुझे समझाना ज़रूरी है

अगर तू ना समझ है तो तुझे समझाना ज़रूरी है
जो दिल की बात है तेरी  जुबा पे लाना ज़रूरी है

लुटा के आँख के प्यारे से अश्को के ये मोती
उसूलो पर जहा आच आए टकराना ज़रूरी है

मोह्हबत के सफ़र में तुमको  कौन समझाए
कंहा से बच के चलना है कंहा जाना ज़रूरी है

परिंदे लौट के जब वापस अपनी साखो पे आये
तो डालो को थोडा सा लचक जाना ज़रूरी है

तुम्हारी झील सी आँखों में "आलोक " डूब तो जाये
गर मुह्हबत में कशिश हो थोड़ी तो शरमाना ज़रूरी है

अपनी प्यास को मेरे होंठो पे रख के अब बोलो
दुनिया के सफ़र में क्या अब भी कुछ पाना ज़रूरी है
________________________________  १ ७ /० ९ /२ ० १ ३ ( आलोक )