Friday, January 2, 2015

एक बूढ़ा पिता

भाई बटे
घर के आँगन में दिवार उठी
धीरे -२ जमीन बँटी
सब खुश थे जंहा 
वँहा एक आँख नम थी
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जिसने सब कुछ बनाया
कोने में बैठा देख रहा
छटपटा रहा
अंदर ही अंदर
…………….... एक बूढ़ा पिता
______( आलोक )_______

Thursday, January 1, 2015

हर पल रहा जो

हर पल रहा जो
साया बन कर मेरा
दिया सब कुछ मुझे
चाहे खुद खाया ना हो एक निवाला
रखा ख्याल पल पल हर पल
बनकर मेरा रखवाला
हां है वो मेरे पिता
_______________आलोक 

बहुत याद आते हो तुम

बातो ही बातो में
कितनी बातो को
अनसुना कर जाते हो तुम

आवाज़ बहुत दी तुम्हे
शायद सुन के
अनसुना कर जाते हो तुम

हम तुम्हे याद आये
ऐसी बातो को भी
छुपा  जाते हो तुम

पर सच कहु बहुत याद आते हो तुम
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आलोक

आलोक ( एक अधूरा सा ख्याल।

धीरे धीरे एक एक दिन
गुजरता जा रहा वक़्त
हर एक लम्हे को जिया
और खुश रहा
कुछ राहो में नए लोग मिले
तो कुछ पुराने रिश्ते टूट गए
बहुत मुश्किल होता
सफर में अकेले कंही जाना
धीरे -धीरे यकी हुआ
हर सफर में कोई हमसफ़र नहीं होता
मिलना बिछड़ना लगा रहता
जब तक मंज़िल ना मिले
यु ही चलते रहो
शायद मंज़िल मिल जाये
तो कुछ खोये हुए लोग भी मिल जाये
है उम्मीद बाकि अभी
पर ये मिलने और बिछड़ने का सिलसिला
यु  ही चलता रहेगा
वक़्त थमता नहीं
अपनी रफ़्तार से निकलता रहेगा
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आलोक ( एक अधूरा सा ख्याल। . यु ही )

Saturday, September 20, 2014

कुछ सपने अपने साथ चले

एक उम्र बिता दी हमने तुमने
इस जीवन की आपा धापी में

कुछ दोस्त मिले इन राहो में
तो कुछ अपनों को खोया हमने

कुछ सपने अपने साथ चले
तो कुछ टूटे जीवन की राहो में

कुछ तनहा तनहा रात कटी
कुछ कटी दिन के उजियारो में

कुछ रिश्ते अपने साथ चले
तो कुछ अपनों ने ठुकराया भी

बुरे वक़्त पे जब सब हुए किनारे
तो कुछ गैरो ने साथ निभाया भी

मिल ही जाते है हमको अक्सर
कुछ सच्चे साथ निभाने  वाले

 हो सुख चाहे दुःख देते है साथ
हम सब की जीवन की राहो पर

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आलोक पाण्डेय

















Saturday, September 13, 2014

बरसो बाद

बरसो बाद आज वो जो मिली हमसे
आँखे उसकी जी भर के रोयी
करने थे बहुत शिकवे -गीले
उस से पहले वो हमे गले लगा के रोयी
अब कैसे कह दू मै उसे बेवफा
वो अपनी मजबूरिया बता के रोयी
नम हो गयी मेरी भी आँखे तब
वो सिर्फ मेरी है ये बता के रोयी
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आलोक 

परेशान ज़िन्दगी

औरो से क्या मिला मुझे उस का गम नहीं
है अपनों की वजह से परेशान ज़िन्दगी
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आलोक 

Tuesday, September 9, 2014

तुम आओ तो एक बार सही

सारे सपने अपने हो जायेंगे
तुम आओ तो एक बार सही

कुछ मीठी मीठी बाते होंगी
कुछ खट्टी मीठी यादे होंगी

हर खुशिया तब अपनी होंगी
तुम आओ तो एक बार सही

हर शाम सुहानी होगी तब
जब तुम करीब आ जाओगी

राते झिलमिल चाँद सितारे
खुशिया होंगी बस आँगन में

भूल के सारे शिकवे गिले
तुम आओ तो एक बार सही

मेरा मन जितना व्याकुल है
तुम भी उतनी है तड्पी होगी

एक लिए मिलन की आस पे
कैसे कितनी राते काटे होंगी

अब लौट भी आ तू ये हमदम
बिन तेरे है सब कुछ सुना सुना

एक नयी सुबह होगी फिर से
तुम आओ तो एक बार सही
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@आलोक पाण्डेय



Monday, September 8, 2014

बेख़ौफ़ होके करना है

बेख़ौफ़ होके करना है तो आ मेरे सीने पे वार कर
यु दोस्तों से मिलके मेरे मेरी कमजोरिया ना पूछ
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@ आलोक 

Friday, August 22, 2014

छोटी सी ज़िन्दगी

इस छोटी सी ज़िन्दगी में लगा है आना जाना
कुछ ख्वाब टूटे तो कुछ ख्वाबो का संवर जाना

कभी -२  मचलता है ये मन कुछ पाने की चाह में
और कभी लगता है सब कुछ. यु ही छोड़ जाना

इस तरन्नुम में तो खिलते है  बहुत से गुलाब
कुछ मंदिर पहुंचे तो कुछ का पैरो से कुचल जाना

बहुत सवांरा , बहुत कोशिस की बने रहे हम यु ही
पर शायद किस्मत में लिखा था रिस्तो का टूट जाना

आँखे नम थी थोड़ा ठहरा रुका तेरा इंतज़ार किया
पर तुझको तो आता था वादा करके मुकर जाना

बरसो बाद तुझे याद आई मेरी हाल पूछा जो मेरा
मैंने भी सिख लिया जो तुम्हे भूले उसे तुम भूल जाना..

______________________________( आलोक पाण्डेय )
https://www.facebook.com/alok1984

Thursday, June 5, 2014

एक ग़ज़ल

सुबह हुई तो कुछ निखर आये हम
रात सपनो में फिर कंही गुम हो गयी
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लिखना जो चाहा एक ग़ज़ल
तो ये आँखे बहुत रोई
तुझे याद करके
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मै क्या क्या कहु कैसे बीते है दिन
उन्हें क्या पता कैसे जीते है हम

पेट की भूख ले आई गांव से शहर
हर कोने में अब भटकते है हम

सर पे छत जो मिली इतनी बड़ी
चाँद सितारों से बाते करते है हम

कुछ भी ना मिला मै गुम हो गया
एक फुटपाथ है जिसपे सोते है हम
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आलोक पाण्डेय





Wednesday, June 4, 2014

तू है यही कंही आस पास

हादसों की दुनिया में मैंने है सब कुछ पाया
बस नहीं मिला मुझको बस एक प्यार तुम्हारा

गलियो -गलियो ढूंढा तुझको सपने भी तेरे देखे
जाने कहा गयी तुम आया ना कोई खत दुबारा

एक तेरी खातिर मैंने  जाने कितने अपने खोये
फिर भी ना हो  पाया बस एक दीदार तुम्हारा

काबा गया काशी गया हर मंदिर पे टेका माथा
टूट गयी सारी उम्मीदे फिर नहीं हुआ विश्वास

जीवन के इस भाग दौड़ में क्या खोया क्या पाया
फिर भी दिल कहता है तू है यही कंही आस पास
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आलोक पाण्डेय

Friday, May 23, 2014

है अगर प्यार सच्चा तो

वो शख्स रूठा है बहुत दिनों से
बोलो आजमाना चाहिए
या मनाना चाहिए ?

मै कहता हु …
है अगर प्यार सच्चा तो
खुद ही हाथ बढ़ाना चाहिए

दूर रहने से बढ़ जाती दूरिया अक्सर
बैठ के शिकवे गीले मिटाना चाहिए

माना की लब खामोश है उसके
पर आँखे अक्सर बोलती है
सुना है मैंने
कभी कभी खुद को पाने के लिए
आँखों को भी पढ़ा जाना चाहिए
है प्यार दो दिलो के दरमियाँ अगर
तो रूठे हुए शख्स को लौट आना चाहिए

ना होता गर उसे प्यार तुझसे
तो रोती क्यों उसकी आँखे इतना
ये प्यार ही तो है
जो बरसो से लिपटी रही
तुझसे साये की तरह

माना हुई उससे कोई खता
तो हो जाओ खफा
पर कुछ लम्हों के बाद उसे करीब लाना चाहिए

सोचना कभी क्यों थे तुम दोनों
एक दूसरे के साथ ' आलोक '
शायद वो प्यार था
तुम्हे उसे वापस पाना चाहिए

वो शख्स कितना कीमती है तुम्हारे लिए
उसे हस के फिर से गले लगाना चाहिए
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आलोक पाण्डेय  ( २४/०५/२०१४  )





लिखी एक ग़ज़ल

एक कोरे से कागज पे जो लिखा तेरा नाम
मानो जैसे तू सामने बैठी हुई मुस्करा रही है

रखा जो एक गुलाब किताबो में तेरे नाम का
ऐसा लगा की तू मेरे साथ गुनगुना रही है

लिखी एक ग़ज़ल जो तुझको याद करके मैंने
अब भी पन्नो से तेरी खुसबू की महक आ रही है

अब तू ही बता कैसे कहु साथ नहीं तू मेरे हमदम
रात  के ख्वाबो में मेरे तू ही तू नज़र आ रही है

ये हवा ये रस्क ये फूलो की महक कहती है कुछ
ऐसा लगता है तू धीरे -२ मेरे करीब आ रही है
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आलोक पाण्डेय ( २४/०५ /२०१४  )

Thursday, May 8, 2014

आदमी ही आदमी को सताते रहे

सफ़र मे लोग आते रहे लोग जाते रहे
आदमी ही आदमी को सताते रहे

पंछी निकले थे घोसलों से अभी
लोग उनको शिकार बनाते रहे

लूट के खा गये देश को भेड़िये (इंसान)
हम अपनों को हि आजमाते रहे

लाश गिरती रही सरहदो पे मगर
हम जश्न अपने घर का मानते रहे

उम्र है जब बच्चो के  खेलने के
उनके हाथों मे तमंचे थमाते रहे

भाई -भाई को नहि देखता है इधर
पहले जो गले से गले मिलाते रहे

हाथ थाम के किसी को सहारा दीया
उसे भलाई बता हम गिनाते रहे

बूढ़े मा -बाप का दुख किसने देखा भला
लोग खुद में मदमस्त हो जीते जा रहे

है  नाजुक बहुत मेरे हालात जो अब
मेरे अपने भि मुझे छोड़ के जाते रहे

बच्चे रोते रहे घर मे रात भर भूख से
दूध-घी लोग पत्थलो पे चढ़ाते रहे

लुटती रही बेटिया जलती रहीं बस्तिया
आँख पे बांध पट्टी हम मुह  छुपाते रहे

ज़िन्दगी ने दिये बहुत से रिश्ते हमे
कुछ हसाते रहे तो कुछ रूलाते रहे

 कोई मन्दिर गया कोइ मस्जिद गया
आलोक माँ के क़दमों मे सर झुकाते रहे
___________________________  ( आलोक पाण्डेय  )